आज लगभग हर बिज़नेस के पास बहुत सारा डेटा होता है।
- सेल्स के नंबर्स उपलब्ध हैं।
- परचेज़ रिकॉर्ड किया जाता है।
- इन्वेंटरी की जानकारी लिखी जाती है।
- कस्टमर की डिटेल्स सेव की जाती हैं।
- एम्प्लॉयी परफॉर्मेंस ट्रैक किया जाता है।
- फाइनेंस डेटा नियमित रूप से अपडेट होता है।
पहले कोई एक्सेल फाइल चेक करता है। कोई व्हाट्सऐप मैसेज खोजता है। फिर कोई अकाउंट्स डिपार्टमेंट से नंबर्स कन्फर्म करता है। कई कॉल, फॉलो-अप और बदलाव के बाद मैनेजमेंट को फाइनल रिपोर्ट मिलती है।
लेकिन तब तक निर्णय लेने में देर हो चुकी होती है।
असल समस्या डेटा की कमी नहीं है। समस्या यह है कि डेटा डिसीजन-रेडी नहीं है।
डेटा होना और उपयोगी जानकारी होना अलग है
रॉ डेटा केवल बताता है कि क्या रिकॉर्ड किया गया है। डिसीजन-रेडी जानकारी बताती है कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और कहाँ एक्शन लेने की ज़रूरत है।
उदाहरण के लिए:
• “इस महीने ₹25 लाख की सेल्स हुई” केवल डेटा है।
• “सेल्स टारगेट से ₹5 लाख कम है, क्योंकि दो एरिया में कन्वर्ज़न कम हुआ है” डिसीजन-रेडी जानकारी है।
इसी तरह:
• “हमारे पास ₹40 लाख की इन्वेंटरी है” केवल डेटा है।
• “₹8 लाख की इन्वेंटरी पिछले 90 दिनों से नहीं बिकी और हमारा वर्किंग कैपिटल ब्लॉक कर रही है” डिसीजन-रेडी जानकारी है।
डेटा तभी उपयोगी बनता है, जब उसे चेक किया जाए, सही तरीके से व्यवस्थित किया जाए, पुराने नंबर्स से कम्पेयर किया जाए और आसान तरीके से समझाया जाए।
आपके पास हज़ारों एंट्रीज़ हो सकती हैं, लेकिन यदि डेटा अधूरा, पुराना या अलग-अलग जगहों पर अलग है, तो उसके आधार पर सही निर्णय नहीं लिया जा सकता।
अलग-अलग जगह बिखरे डेटा का नुकसान
कई एमएसएमई में जानकारी अलग-अलग जगहों पर होती है:
• सेल्स डेटा सेल्स टीम के पास होता है।
• पेमेंट डिटेल्स अकाउंट्स टीम के पास होती हैं।
• स्टॉक की जानकारी स्टोर डिपार्टमेंट के पास होती है।
• कस्टमर फॉलो-अप अलग-अलग व्हाट्सऐप चैट में होते हैं।
• प्रोडक्शन अपडेट रजिस्टर में लिखे जाते हैं।
• एम्प्लॉयी परफॉर्मेंस अधिकतर मौखिक फीडबैक के आधार पर चेक किया जाता है।
इसलिए हर डिपार्टमेंट के पास अलग नंबर्स हो सकते हैं।
मैनेजमेंट मीटिंग में समस्या का समाधान निकालने के बजाय यह तय करने में समय चला जाता है कि कौन-से नंबर्स सही हैं।
“अब हमें क्या एक्शन लेना चाहिए?” पर बात करने के बजाय लोग पूछते रहते हैं, “सही फिगर कौन-सा है?”
इससे कई समस्याएँ होती हैं:
• निर्णय लेने में देरी होती है।
• समस्याओं का पता देर से चलता है।
• एम्प्लॉयी रिपोर्ट बनाने में कई घंटे लगाते हैं।
• अलग-अलग डिपार्टमेंट अलग नंबर्स दिखाते हैं।
• बिज़नेस ओनर जानकारी के लिए कुछ खास लोगों पर निर्भर हो जाता है।
• निर्णय सही जानकारी के बजाय अनुमान के आधार पर लिए जाते हैं।
गलत या अधूरा डेटा केवल रिपोर्टिंग की समस्या नहीं है। यह सही निर्णय लेने और उसे लागू करने में भी परेशानी पैदा करता है।
डेटा को डिसीजन-रेडी कैसे बनाएँ?
डिसीजन-रेडी डेटा के लिए हमेशा महँगे सॉफ्टवेयर या कॉम्प्लेक्स सिस्टम की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए एक सही प्रोसेस और टीम में अनुशासन चाहिए।
हर महत्वपूर्ण बिज़नेस नंबर को पाँच सवालों का जवाब देना चाहिए:
1. क्या डेटा सही है?
नंबर्स वही दिखाने चाहिए, जो वास्तव में हुआ है। यदि सेल्स, डिस्पैच, पेमेंट और इन्वेंटरी रिकॉर्ड आपस में मैच नहीं करते, तो मैनेजमेंट रिपोर्ट पर भरोसा नहीं कर सकता।
2. क्या डेटा सही समय पर उपलब्ध है?
निर्णय लेने का समय निकल जाने के बाद मिलने वाली सही रिपोर्ट भी अधिक उपयोगी नहीं होती।
यदि प्रोडक्शन में हो रही देरी की रिपोर्ट महीने के अंत में मिलेगी, तो उससे आज की समस्या नहीं रोकी जा सकती। इसी तरह, ओवरड्यू पेमेंट रिपोर्ट तीन महीने में एक बार देखने से कैश फ्लो को सही तरीके से मैनेज नहीं किया जा सकता।
3. क्या डेटा आसानी से मिल सकता है?
महत्वपूर्ण जानकारी किसी एक एम्प्लॉयी की उपलब्धता पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। न ही वह अलग-अलग फाइलों, रजिस्टरों और मैसेज में बिखरी होनी चाहिए।
टीम के संबंधित लोगों को पता होना चाहिए कि लेटेस्ट और कन्फर्म डेटा कहाँ मिलेगा।
4. क्या डेटा की ज़िम्मेदारी तय है?
हर रिपोर्ट और महत्वपूर्ण नंबर का एक स्पष्ट ओनर होना चाहिए।
- डेटा कौन भरेगा?
- उसे चेक कौन करेगा?
- उसका एनालिसिस कौन करेगा?
- उसे कब तक अपडेट करना है?
जब ज़िम्मेदारी तय नहीं होती, तो डेटा समय पर अपडेट नहीं होता और गलतियाँ भी ठीक नहीं की जातीं।
5. क्या डेटा एक्शन लेने में मदद करता है?
डैशबोर्ड का काम केवल नंबर्स दिखाना नहीं है। उसे गैप, ट्रेंड, समस्या और प्रायोरिटी भी स्पष्ट करनी चाहिए।
- यदि सेल्स टारगेट से कम है, तो कमी कहाँ है?
- यदि खर्च बढ़ा है, तो कौन-सा खर्च बढ़ा है?
- यदि इन्वेंटरी बढ़ रही है, तो कौन-सा मटेरियल इस्तेमाल नहीं हो रहा?
- यदि प्रोडक्टिविटी कम हो रही है, तो किस प्रोसेस में देरी है?
रिपोर्टिंग का उद्देश्य केवल अधिक रिपोर्ट बनाना नहीं है। उसका उद्देश्य अगला एक्शन स्पष्ट करना है।
डैशबोर्ड को सवाल कम करने चाहिए
एक सही डैशबोर्ड मैनेजमेंट को बिज़नेस की स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी देता है।
डैशबोर्ड में हर नंबर दिखाना ज़रूरी नहीं है। उसमें केवल वे महत्वपूर्ण नंबर्स होने चाहिए, जो निर्णय लेने में मदद करते हैं, जैसे:
• टारगेट के मुकाबले वास्तविक सेल्स
• इन्क्वायरी से ऑर्डर का कन्वर्ज़न
• ग्रॉस मार्जिन
• मिलने वाले और ओवरड्यू पेमेंट
• इन्वेंटरी मूवमेंट
• प्रोडक्शन स्टेटस
• कस्टमर कम्प्लेंट्स
• एम्प्लॉयी और डिपार्टमेंट परफॉर्मेंस
• तुरंत एक्शन की ज़रूरत वाले मुख्य गैप
डैशबोर्ड बिखरे हुए डेटा को उपयोगी जानकारी में बदल सकता है, लेकिन केवल टेक्नोलॉजी समस्या का समाधान नहीं कर सकती।
यदि गलत डेटा डाला जाएगा, तो अच्छा दिखने वाला डैशबोर्ड भी गलत जानकारी देगा।
इसलिए सबसे पहले डेटा कलेक्ट करने, चेक करने, अपडेट करने और रिव्यू करने का सही प्रोसेस बनाइए। इसके बाद उस प्रोसेस को तेज़ और आसान बनाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कीजिए।
अपने बिज़नेस को डेटा-रेडी बनाइए
एमएसएमई बिज़नेस ओनर्स इन आसान स्टेप्स से शुरुआत कर सकते हैं:
1. हर सप्ताह और हर महीने लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों की लिस्ट बनाइए।
2. तय कीजिए कि उन निर्णयों के लिए कौन-से नंबर्स चाहिए।
3. हर नंबर के लिए एक स्टैंडर्ड फॉर्मेट और एक भरोसेमंद सोर्स बनाइए।
4. डेटा भरने और चेक करने की ज़िम्मेदारी तय कीजिए।
5. रिपोर्ट कब अपडेट होगी, यह तय कीजिए—डेली, वीकली या मंथली।
6. केवल फाइनल टोटल नहीं, बल्कि ट्रेंड और गैप भी रिव्यू कीजिए।
7. हर रिव्यू के बाद एक्शन, ओनर और डेडलाइन तय कीजिए।
लक्ष्य अधिक डेटा इकट्ठा करना नहीं है। लक्ष्य सही डेटा को सही समय पर उपलब्ध कराना है, ताकि उससे समय रहते सही निर्णय लिया जा सके।
कोई बिज़नेस केवल इसलिए डेटा-ड्रिवन नहीं बनता, क्योंकि उसके पास कई फाइलें, रजिस्टर या डैशबोर्ड हैं। बिज़नेस वास्तव में डेटा-ड्रिवन तब बनता है, जब उसके लीडर्स स्थिति को जल्दी समझ सकें और विश्वास के साथ तय कर सकें कि अब आगे क्या करना है।
डेटा तभी उपयोगी बनता है, जब वह सही हो, आसानी से उपलब्ध हो और निर्णय लेने के समय तैयार हो।
